डिजिटल गिरफ्तारी का जाल : भोपाल के दंपति से ₹37.60 लाख की ठगी
भोपाल के एक सेवानिवृत्त दंपति को मुंबई पुलिस अधिकारी बनकर ठगों ने “Digital Arrest” के नाम पर निशाना बनाया। नकली दस्तावेजों, वीडियो कॉल और गिरफ्तारी की धमकी के जरिए उनसे ₹37.60 लाख ट्रांसफर कराए गए।

यह लेख सुनें
इस ब्राउज़र में टेक्स्ट-टू-स्पीच उपलब्ध नहीं है।
घटना की तारीख : 30 अप्रैल 2026
1. पीड़ितों का इतिहास: भोपाल के अरेरा कॉलोनी क्षेत्र में रहने वाले अविनाश कक्कड़ और उनकी पत्नी शशि कक्कड़ इस डिजिटल गिरफ्तारी की ठगी के पीड़ित हैं। अविनाश कक्कड़ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और अपनी पत्नी के साथ रहते थे। अप्रैल 2026 के अंत में अज्ञात व्यक्तियों ने उनके दूरभाष पर संपर्क किया। आरोपियों ने स्वयं को मुंबई पुलिस का अधिकारी बताकर दंपति को एक गंभीर कानूनी मामले में फंसे होने का विश्वास दिलाया।
2. घटनाओं की श्रृंखला:
30 अप्रैल 2026 की रात अविनाश कक्कड़ को दूरभाष पर संदेश सेवा के माध्यम से वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्तियों ने स्वयं को मुंबई पुलिस का अधिकारी बताया और उनके बैंक खातों में संदिग्ध लेन-देन होने का आरोप लगाया। उन्हें गंभीर कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी की आशंका बताकर डराया गया। इसके बाद आरोपियों ने उन्हें “डिजिटल गिरफ्तारी” के नाम पर लगातार वीडियो कॉल और संदेशों के माध्यम से अपने नियंत्रण में रखा। ठगों ने जांच से बचने के लिए बैंक खातों में मौजूद धनराशि को “सत्यापन” या सुरक्षित जांच के नाम पर उनके द्वारा बताए गए खातों में स्थानांतरित करने के लिए कहा। इस प्रक्रिया को आधिकारिक दिखाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के नाम से जाली दस्तावेज भी भेजे गए। आरोपियों के दबाव में दंपति ने उनके निर्देशों के अनुसार कुल ₹37 लाख 60 हजार रुपये बैंक खातों में स्थानांतरित कर दिए। इस मामले में फेडरल बैंक और इंडसइंड बैंक से संबंधित लेन-देन का भी उल्लेख किया गया है। आरोपियों ने दंपति को लगातार संपर्क में रखकर उन्हें अन्य लोगों से संपर्क करने से रोकने का प्रयास किया। इस पूरी घटना के दौरान उन पर लगातार मानसिक दबाव बनाया गया। अंततः जब घटना की जानकारी सामने आई, तब दंपति ने हबीबगंज पुलिस से शिकायत की और मामले की जांच शुरू की गई।
3. ठगों द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली:
इस मामले में साइबर अपराधियों ने सरकारी अधिकारियों का रूप धारण करना मुख्य तरीका बनाया। उन्होंने स्वयं को मुंबई पुलिस का अधिकारी बताकर पीड़ितों के मन में कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का भय पैदा किया। दूरभाष पर वीडियो कॉल और लगातार संदेशों के माध्यम से उन्होंने पीड़ितों पर नियंत्रण बनाए रखा। ठगी को अधिक विश्वसनीय दिखाने के लिए आरोपियों ने सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी संस्थाओं के नाम से जाली दस्तावेज तैयार करके भेजे। इसके बाद बैंक खातों में संदिग्ध लेन-देन होने का झूठा दावा करके “सत्यापन” के नाम पर धनराशि स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया। इस प्रकार अधिकार का दुरुपयोग, जाली दस्तावेज, तकनीक और आर्थिक दबाव—इन सभी का एक साथ इस्तेमाल किया गया।
4. भावनात्मक कारकों का दुरुपयोग:
इस ठगी में पीड़ितों के कानूनी परिणामों के भय का बड़े स्तर पर दुरुपयोग किया गया। गिरफ्तारी होने और गंभीर अपराध की जांच का सामना करने की बात कहकर उन पर मानसिक दबाव बनाया गया। इसके साथ ही आरोपियों ने स्वयं को पुलिस अधिकारी बताकर अपनी बात को आधिकारिक रूप देने का प्रयास किया। सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के नाम से जाली दस्तावेज भेजकर पीड़ितों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया गया कि उनके विरुद्ध वास्तव में कानूनी कार्रवाई चल रही है। लगातार वीडियो कॉल, संदेश और अन्य लोगों से संपर्क न करने के निर्देशों के कारण पीड़ितों को स्थिति की स्वतंत्र रूप से जांच करने का अवसर नहीं मिला।
5. परिणाम:
इस डिजिटल गिरफ्तारी की ठगी में दंपति को कुल ₹37 लाख 60 हजार रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। आर्थिक नुकसान के साथ-साथ उन्हें अत्यधिक मानसिक दबाव और भय का भी सामना करना पड़ा। घटना के बाद हबीबगंज पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। साइबर अपराध शाखा द्वारा जिन बैंक खातों में धनराशि स्थानांतरित की गई, उनकी जानकारी, ठगी में इस्तेमाल किए गए दूरभाष नंबरों और डिजिटल संवाद की जांच की जा रही है। इस जांच के माध्यम से ठगी में शामिल आरोपियों का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।
6. सुरक्षित रहने के उपाय:
यदि कोई व्यक्ति दूरभाष या वीडियो कॉल के माध्यम से स्वयं को पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो या किसी अन्य सरकारी अधिकारी के रूप में प्रस्तुत करता है, तो उस पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए। गिरफ्तारी, जांच या कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर पैसे या बैंक खाते से संबंधित जानकारी मांगी जाए, तो कोई भी आर्थिक लेन-देन नहीं करना चाहिए। संदेश सेवा के माध्यम से प्राप्त सरकारी या न्यायालय संबंधी दस्तावेजों को वास्तविक मानने से पहले उनकी स्वतंत्र रूप से आधिकारिक माध्यम से पुष्टि करनी चाहिए। ऐसी परिस्थिति में घबराकर अकेले निर्णय लेने के बजाय परिवार के सदस्यों, किसी विश्वसनीय व्यक्ति या संबंधित आधिकारिक संस्था से संपर्क करना चाहिए। “डिजिटल गिरफ्तारी” के नाम पर लगातार वीडियो कॉल पर रखा जाना गंभीर साइबर ठगी का संकेत हो सकता है। संदिग्ध आर्थिक लेन-देन या साइबर ठगी होने पर तुरंत पुलिस या साइबर अपराध शाखा में शिकायत करनी चाहिए। साथ ही दूरभाष नंबर, संदेश, छायाचित्र, दस्तावेज और आर्थिक लेन-देन से संबंधित जानकारी जैसे सभी उपलब्ध प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए।
तुरंत क्या करें
ठग से संपर्क तोड़ें
कॉल या चैट बंद करें. सामने वाला आधिकारिक या गुस्से में लगे, तब भी बात जारी न रखें.
पैसे गए हों तो 1930 पर कॉल करें
पहला घंटा ट्रांसफर रोकने का सबसे अच्छा मौका देता है.
सबूत बचाएं
लेन-देन आईडी, फोन नंबर, लिंक, स्क्रीनशॉट और कॉल रिकॉर्ड रखें.
सुरक्षा चेकलिस्ट
- Never share OTPs, PINs, passwords, or screen-sharing access.
- Verify urgent claims using official phone numbers only.
- Talk to a trusted person before moving money under pressure.
- Report suspicious calls and messages quickly.







